कुंडलिया छंद के तीन प्रकार -
*1.'नव कुंडलिया 'राज' छंद'*
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'नव कुंडलिया 'राज' छंद' , छंद शास्त्र और साहित्य-क्षेत्र में मेरा एक अभिनव प्रयोग है | इस छंद की रचना करते हुए मैंने इसे 16-16 मात्राओं के 6 चरणों में बाँधा है, जिसके हर चरण में 8 मात्राओं के उपरांत सामान्यतः (कुछ अपवादों को छोडकर ) आयी 'यति' इसे गति प्रदान करती है | पूरे छंद के 6 चरणों में 96 मात्राओं का समावेश किया गया है |
'नव कुंडलिया 'राज' छंद' की एक विशेषता यह भी है कि इसके प्रथम चरण के प्रारम्भिक 'कुछ शब्द' इसी छंद के अंतिम चरण के अंत में पुनः प्रकट होते हैं | या इसका प्रथम चरण पलटी खाकर छंद का अंतिम चरण भी बन सकता है |
छंद की दूसरी विशेषता यह है कि इस छंद के प्रत्येक चरण के 'कुछ अंतिम शब्द ' उससे आगे आने वाले चरण के प्रारम्भ में शोभायमान होकर चरण के कथ्य को ओजस बनाते हैं | शब्दों के इस प्रकार के दुहराव का यह क्रम सम्पूर्ण छंद के हर चरण में परिलक्षित होता है | इस प्रकार यह छंद 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' बन जाता है |
'नव कुंडलिया 'राज' छंद' में मेरा उपनाम 'राज ' हो सकता है बहुत से पाठकों के लिये एतराज का विषय बन जाए या किसी को इसमें मेरा अहंकार नज़र आये | इसके लिये विचार-विमर्श के सारे रास्ते खुले हैं |
'नव कुंडलिया 'राज' छंद' पर आपकी प्रतिक्रियाओं का मकरंद इसे ओजस बनाने में सहायक सिद्ध होगा |
*2. 'सर्प कुण्डली 'राज' छंद'*
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'सर्प कुंडली 'राज' छंद' भी छंदशास्त्र और साहित्य-क्षेत्र में मेरा एक अभिनव प्रयोग है | इस छंद की रचना करते हुए मैंने इसे 13, 13 मात्राओं के दो चरणों से 26 मात्राओं की एक पंक्ति के रूप में बाँधा है, जिसके हर चरण में 13 मात्राओं के उपरांत सामान्यतः (कुछ अपवादों को छोडकर ) आयी 'यति' इसे गति प्रदान करती है |
'सर्प कुण्डली 'राज' छंद' की दूसरी विशेषता यह है कि प्रथम व अंतिम चरण को छोड़कर इस छंद का प्रत्येक चरण उससे आगे आने वाले चरण के प्रारम्भ में शोभायमान होकर चरण के कथ्य को ओजस बनाता हुआ आगे बढ़ता है | शब्दों के इस प्रकार के दुहराव का यह क्रम सम्पूर्ण छंद के हर चरण में इस प्रकार परिलक्षित होता है, जैसे कोई सर्प कुंडली मारकर बैठा हो |। और इस प्रकार यह छंद 'सर्प कुण्डली 'राज' छंद' बन जाता है | 'सर्पकुण्डली 'राज' छंद की हर पंक्ति 26 मात्रा की होती है।इसकी प्रत्येक पंक्ति एक-दूसरे से जुड़ी होने के कारण यह छंद गीतात्मक रूप धारण कर लेता है।इस छंद का तुक-विन्यास ग़ज़ल और हज़्ल जैसा होने के बावजूद कवित्त की तरह भावान्विति लिए होता है। इस छंद का तुकविन्यास स्वर और व्यंजन के संयुक्त रूप से बनता है, जो कि ग़ज़ल के स्वरांत से एकदम भिन्नता लिए होता है।
इस छंद में मैंने 2-2 पंक्तियों की 26 मात्राओं से एक तेवर बनाया है। ऐसे 5 तेवरों को मिलाकर मैंने अनेक तेवरियों का सृजन किया है।
'सर्प कुंडली 'राज' छंद' में भी मेरा उपनाम 'राज ' हो सकता है बहुत से पाठकों के लिये एतराज का विषय बन जाए या किसी को इसमें मेरा अहंकार नज़र आये | इसके लिये विचार-विमर्श के सारे रास्ते खुले हुए हैं |
इस पुस्तक में कुण्डलिया छंद का एक बहुचर्चित और मान्यता प्राप्त छंद भी संकलित है-
*3.'कुण्डलिया छंद'*
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कुंडलिया दोहा और रोला के संयोग से बना छंद है। इस छंद के 6 चरण होते हैं तथा प्रत्येकचरण में 24 मात्राएँ होती है। कुंडलिया के पहले दो चरण दोहा तथा शेष चार चरण रोला से बने होते हैं। दोहा के प्रथम एवं तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।रोला का प्रथम चरण11मात्राओं तथा दूसरा चरण 13 मात्राओं का होता है।
*रमेशराज
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