कहमुकरी संरचना में एक ग़ज़ल
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चीख निकलती उसको देख, चाहे दिन हो या अंधेर
मार झपट्टा लेता गेर, क्या सखि साजन? ना सखि शेर।
उसने छोड़ा तुरत वियोग, मन में उसके जागा भोग
क्या सखि साजन? ना सखि आज, अंधे के कर लगी बटेर।
ऐसे उसने डाला रंग, सोने जैसे चमके अंग
क्या ये सब साजन के संग? ना सखि आयी धूप मुँडेर।
भीगी चूनर-भीगा गात, चमके बिजुरी जी घबरात
क्या सँग साजन? ना री! मेघ, आज गया जल खूब उकेर।
आकर दो दर्शन भरतार, कब से तुमको रही पुकार
सखी रही तू साजन टेर? नहीं रही प्रभु-माला फेर।
+रमेशराज
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