आलेख (काव्य की आत्मा और रागात्मकता )

आलेख (काव्य की आत्मा और रागात्मकता )

by

Rameshraaj

• 19 Jul, 2026

काव्य की आत्मा और रागात्मकता
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काव्य के संदर्भ में जब-जब काव्य की आत्मा को पहचानने की कोशिश की गयी है, तो रसाचार्यों ने भाव के आधार पर रस को, अलंकार वादियों ने अलंकार, ध्वनिवादियों ने ध्वनि, औचित्यवादियों ने औचित्य को काव्य की आत्मा सिद्ध करने का अथक प्रयास किया है। काव्य के विभिन्न सम्प्रदायों के तहत काव्य की आत्मा को भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से परखने का परिणाम यह है कि आज तक रस, अलंकार, ध्वनि, औचित्य आदि में से किसी को भी काव्य की आत्मा स्वीकारे जाने की स्थिति न बन सकी। ऐसा काव्य को कोरे अवैज्ञानिक एवं भावात्मक तरीकों से परखने के कारण हुआ। अच्छा यह होता कि काव्य की आत्मा के संदर्भ में, किसी भी प्रकार का निर्णय लेने से पूर्व, मानव की आत्मा को तय कर लिया जाता, तत्पश्चात् काव्य की आत्मा के संदर्भ में खोज प्रारम्भ की जाती, क्योंकि काव्य का सृजन मानव समाज द्वारा अन्ततः मानव समाज के लिये ही किया जाता है, अतः मानव की आत्मा का, काव्य की आत्मा से कोई सम्बन्ध न हो, ऐसा असम्भव है।
आत्मा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए आचार्य ध्रुव कहते हैं कि-‘‘ यदि काव्य अनुकरण है तो वह वाह्य सृष्टि का अनुकरण नहीं, बल्कि सृष्टि के आत्मतत्त्व का अनुकरण है और सृष्टि के आत्मतत्त्व का अर्थ है-मनुष्य के जीवन के चरित्र लक्षण, भाव और कर्म।’’
काव्य की आत्मा के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिये आचार्य ध्रुव जिन तत्त्वों की ओर संकेत करते हैं, वे तत्त्व मनुष्य की उस चेतना से सम्बन्ध रखते हैं, जिसके माध्यम से उसका भावात्मक, चारित्रिक कर्मक्षेत्र स्पष्ट होता है। अतः यह स्पष्ट है कि मनुष्य के कर्मक्षेत्र की सृष्टि, मनुष्य की वह मानसिक सृष्टि है, जिसके माध्यम से वह एक सामाजिक प्राणी का स्वरूप ग्रहण करता है। मनुष्य की यही समाजोन्मुखी मानसिक सृष्टि, निस्संदेह मनुष्य की आत्मा के स्वरूप को समझने में सहायक हो सकती है।
डॉ. नगेन्द्र के अनुसार-‘‘आत्मा का अर्थ है आधार तत्त्व तथा प्रयोजन का अर्थ है उद्देश्य। और ये ही दो तत्त्व किसी प्राणी या वस्तु के मानदंड या मूल्य का निर्धारण करते हैं।’’
प्रश्न यह है कि आत्मा के आधार तत्त्व क्या हैं? इसका उत्तर डॉ. नगेन्द्र से तो नहीं, संस्कृत आचार्य इस प्रकार देते हैं-
‘रसस्यादि त्वमापतस्य धर्मा शौर्यादयोयथा।’’
अर्थात् प्राणी के शरीर में सारभूत आत्मतत्त्व के रूप में धर्म , शौर्य औदार्य आदि होते हैं। उक्त पंक्तियों का सीधा अर्थ यह है कि मनुष्य की आत्मा की निर्मित्ति मनुष्य के ज्ञानस्वरूप की वह अवस्था है या संरचना है जिसके आधार पर वह धर्म, शौर्य, औदार्य आदि के रूप में अपनी चेतनता, अपने विवेक अर्थात् अपने व्यवहार का परिचय देता है।
आचार्य शंकर ने कठोपनिषद् के भाष्य में एक प्राचीन श्लोक का उदाहरण देते हुए आत्मा की व्युत्पत्ति इस प्रकार मानी है-
‘‘यदाप्नोति यदादत्ते यच्चायत्ति विषययित
यच्चास्य सन्ततो भावस्त स्माद् आत्मेति कीर्त्यते।
अर्थात् आत्मा प्राणी के शरीर का वह चेतनतत्त्व है जो
1. विषयों को प्राप्त करता है
2. उन्हें ग्रहण करता है
3. इनका उपभोग करता है तथा यह सत् है।[1]
आत्मा के उक्त़ विवेचन के उपरांत जो तथ्य उभरकर सामने आते हैं, वे इस प्रकार हैं-
1. आत्मा मनुष्य की वह चेतना है, जिसके अन्तर्गत वह अपने ज्ञान का विकास एवं उपयोग करता है।
2. मनुष्य की आत्मा की इस प्रकार चेतनता उसकी ऐन्द्रिक एवं मानसिक प्रक्रिया द्वारा निर्मित या संरचित होती है।
3. आत्मा का सीधा-सीधा सम्बन्ध मनुष्य के चरित्र एवं उसके कर्मक्षेत्र से होता है।
उक्त निष्कर्षों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि आत्मा मनुष्य की वह चेतनता है, जिसके द्वारा वह जगत अर्थात् अपने परिवेश से संवेदना ग्रहण करता है एवं परिवेश के विभिन्न उद्दीपकों को विभिन्न प्रकार के अर्थ प्रदान कर, उनके प्रति अपना एक विशिष्ट प्रकार का व्यवहार निर्धारित करता है। और यही कारण है कि क्रोचे आत्मा की क्रियात्मक प्रणाली को मुख्यतः दो प्रकार की मानते हैं-
क. व्यवहारात्मक ख. विचारात्मक
प्रश्न यह है कि आत्मा की उक्त प्रकार की क्रियाएं क्यों और कैसे सम्पन्न होती हैं। इसका उत्तर देते हुए प्रो. जोसफ मुण्डश्शेरी लिखते हैं कि- ‘‘मानव की आत्माभिव्यक्ति अधिकांशतः प्रयोजन-सापेक्ष होती है | [2]
यह प्रयोजन क्या है और इसकी सापेक्षता किसके प्रति है? इसका हल सही अर्थों में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ही देते हैं। वे ‘रसात्मक बोध के विविध स्थल’ नामक निबन्ध में कहते हैं कि-‘‘ ज्ञान हमारी आत्मा के तटस्थ स्वरूप का संकेत है। किसी वस्तु या व्यक्ति का जानना ही वह शक्ति नहीं है, जो उस वस्तु या व्यक्ति को हमारी अन्तस्सत्ता में सम्मिलित कर दे, वह शक्ति है-राग या प्रेम | [ 3 ]
आचार्य शुक्ल ने आत्मा के सूक्ष्म और सनातन स्वरूप की पकड़ करते हुए जिन तथ्यों की ओर संकेत किया है, वह तथ्य निस्संदेह आत्मा के स्वरूप को समझने में बहुत कुछ सहायक हो सकते हैं। आचार्य शुक्ल के उक्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए, यदि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने की कोशिश की जाये तो आत्मा का स्वरूप मात्र चेतनात्मक, ज्ञानात्मक, व्यावहारिक या वैचारिक ही नहीं ठहरता, उसमें राग या प्रेम की सत्ता भी सम्मिलित हो जाती है। और यही राग या प्रेम की सत्ता, आत्मा के प्रति उन सारे गूढ़ प्रश्नों का उत्तर दे देती है, जिन्हें आचार्य ध्रुव, ‘आत्मतत्त्व के अनुकरण’, डॉ. नगेन्द्र ‘आधारतत्त्व एवं प्रयोजन, आचार्य शंकर ‘चेतनतत्त्व, क्रोचे विचारात्मक एवं व्यावहारात्मक क्रिया तथा प्रो. जोसफ ‘प्रयोजन सापेक्षता’ के रूप में उठाते हैं।
बहरहाल इस बात से कोई भी सुधी या विद्वान चिंतक या आत्म-मर्मज्ञ इन्कार नहीं कर सकता कि प्राणी या मानव की समूची चेतन क्रिया राग या प्रेम की वासना से सिक्त रहती है। राग या प्रेम ही हमारे ज्ञान, व्यवहार या वैचारिक मूल्यवत्ता का वह मूल आधार है, जिसके बिना मानव चेतनाहीन, संज्ञाशून्य हो जाता है। काव्य के संदर्भ में तो यह तथ्य सौ फीसदी सच है कि काव्याभिव्यक्ति बिना प्रेम या राग के किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। काव्य का मूल प्राण राग या प्रेम ही है। तब, क्या मानव या काव्य की आत्मा राग या प्रेम है? यदि राग या प्रेम को काव्य की आत्मा मान लिया जाये तो सवाल यह पैदा होता हे कि इस राग या प्रेम को उत्पन्न करने वाला कौन-सा तत्त्व है? हम यकायक ही किसी से प्रेम नहीं कर बैठते? यकायक ही किसी को अपना मित्र नहीं बना लेते। इसके लिये हमें विभिन्न प्रकार की वैचारिक प्रक्रियाओं से होकर गुज़रना पड़ता है। जो वस्तुएं हमें सुरक्षा [ शारीरिक एवं मानसिक ] प्रदान करती हैं, उनके प्रति हमारा लगाव बढ़ता जाता है, जिसे राग कहा जाता है। राग उत्पन्न करता है रमणीयता को। और जिन वस्तुओं के प्रति रमणीयता बढ़ती है, उनसे हम प्रेम करने लगते हैं। इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि प्रेम के मूल में भी राग की धारा ही बहती है। अतः यह कहना अनुचित न होगा कि राग ही वह मूल प्राणतत्त्व है, जो आत्मा के स्वरूप को तटस्थ रखने के बजाय उसे प्रेममय बनाता है। चूंकि राग को उत्पन्न करने वाली मूल शक्ति हमारी चेतना या चेतना प्रक्रिया होती है, अतः काव्य की आत्मा मात्र न तो राग हो सकती है और न केवल चेतनता। बल्कि इस विषय पर यदि सूक्ष्मता से चिन्तन किया जाये तो काव्य की आत्मा वह रागात्मक चेतना ठहरती है, जिसके दर्शन हमें लौकिक या कथित अलौकिक जगत की चर-अचर वस्तुओं के प्रति तटस्थता नहीं, बल्कि एक विशेष प्रकार की वासना या प्रेम के साथ परोक्ष या अपरोक्ष रूप से होते आये हैं और जब तक यह जगत अस्तित्व में है, होते रहेंगे।
काव्य की आत्मा ‘रागात्मक चेतना’ मानकर चलने पर यदि हम पुनः इस लेख में उल्लेखित विद्वानों के मतों का अवालोकन करें तो आचार्य ध्रुव जब आत्मतत्व का अर्थ मनुष्य के जीवन के चरित्र, लक्षण, भाव और कर्म बतलाते हैं तो इन सब तत्त्वों के मूल में भी हमें वही रागात्मक चेतना अन्तर्निहित मिलती है, जिसके अभाव में यह सारे तत्त्व बेमानी हो जाते हैं, प्राणी के शरीर के सारभूत तत्त्व धर्म , शौर्य, औदार्य आदि का कोई औचित्य नहीं दिखलायी पड़ता। क्रोचे की व्यवहारात्मक एवं विचारात्मक क्रियाएं निष्प्राण और कोरा ज्ञान संकेत बन जाती हैं। और यही कारण है कि आचार्य शंकर आत्मा की पहचान में जिस तत्त्व की ओर विशेष ध्यान देते हुए, आत्मा के स्वरूप की पहचान कराते हैं, वह स्वरूप ‘सत’ है। आचार्य शंकर आत्मा के इस सत् स्वरूप पर अनायास ही जोर नहीं देते। यह सत् तत्त्व ही ऐसा तत्त्व है जो रागात्मकता को समूचे लोक की मंगलकामना या लोकसापेक्षता की चेतना से लैस करता है। बाल्मीकि द्वारा रचित आदि काव्य ‘रामायण’ का भी मूल आधार वही लोकमंगल की कामना है जो राम के चरित्र, लक्षण, भाव, कर्म, धर्म, शौर्य, औदार्य आदि समस्त प्रकार की व्यवहारात्मक एवं वैचारिक क्रियाएं के माध्यम से दर्शायी गयी हैं। लोकमंगल की यह अभिव्यक्ति कितनी सत् है, इस विषय पर मतमतान्तर हो सकते हैं और यह एक इतर विषय है। लेकिन बाल्मीकि, तुलसी से लेकर वर्तमान काव्य में यह सत् तत्त्व अपने-अपने तरीके से, संस्कारों, वैचारिकता के आधार पर विभिन्न रूपों में विद्यमान है, इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता।
यहां प्रश्न यह किया जा सकता है कि यदि काव्य की आत्मा ‘रागात्मक चेतना’ है तो उसमें सत् तत्त्व कहां से टपक पड़ा? उत्तर यह है कि यदि हम काव्य का अर्थ मात्र रसात्मक वाक्यों, ध्वनियों, अलंकारों आदि से ही लेते हैं तो रस, ध्वनि, अलंकार, औचित्य आदि के मूल में रागात्मकता का आलोक तो सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है, लेकिन यह रागात्मकता सत् के अभाव में आत्मा की लोकसापेक्ष, मंगलकारी और सनातन प्रतीति नहीं बन सकती।
अतः हमें काव्य को लोकमंगल के साथ जोड़कर परखने या देखने के लिये इतना तो संशोधन करना ही पड़ेगा कि काव्य की आत्मा मात्र रागात्मक चेतना नहीं, बल्कि ‘सत्योन्मुखी रागात्मक चेतना’ है। और 'सत्योन्मुखी रागात्मक चेतना’ के इस बिन्दु पर आकर हमें आत्मा के उस सात्विक स्वरूप की पहचान हो जाती है जो सामाजिक या लौकिक सम्बन्धों की सार्थकता को कोरे लोकरंजन, भोगविलास, व्यक्तिवाद के बजाय लोकरक्षा या लोकहित के साथ सम्बद्ध करता है।
1. शब्द-शक्ति और ध्वनिसिद्धांत पृष्ठ-११४, डॉ. सत्यदेव चौधरी
2.भा.का.सि., अभिव्यंजना और वक्रोक्तिवाद, पृष्ठ-२१३
3.वही
4.भारतीय काव्य सिद्धांत पृष्ठ-252

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