Krishnayan
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अनुवाद : डॉ. अंजना संधीर कृष्ण एक ऐसा व्यक्तित्व हैं, जिन्हें आप ‘विराट्’ कह सकते हैं। ‘महाभारत’ में कृष्ण एक राजनीतिज्ञ के रूप में प्रकट होते हैं तो ‘भागवत’ में उनका दैवी स्वरूप दिखाई देता है। ‘गीता’ में वे गुरु हैं, ज्ञान का भंडार हैं। ईश्वर होते हुए भी उन्होंने मानव का ही जीवन जीया। वे एक ऐसे इनसान हैं, जिनका शरीर शायद यह दुनिया छोड़कर चला गया, परंतु आत्मा की प्रबलता, स्वच्छता या दिव्यता सर्वव्यापी बन गई। मृत्यु को देख चुके, अनुभव कर चुके कृष्ण जीवन के अंतिम क्षणों में जीवन की कुछ घटनाओं को फिर एक बार देखते हैं, उनकी अनुभूति करते हैं, उन्हें फिर जीते हैं। जीवन के अंतिम प्रयाण से पहले के कुछ क्षणों का एक सूक्ष्म पड़ाव है—‘कृष्णायन’। प्रस्तुत पुस्तक में वह कृष्ण हैं, जिन्हें आप कॉफी की टेबल पर सामने देख सकते हैं। ये वह कृष्ण हैं, जो आपकी दैनिक चर्या में आपके साथ रहेंगे। ये कोई योगेश्वर, गिरधारी, पाञ्चजन्य फूँकनेवाले, गीता का उपदेश देनेवाले कृष्ण नहीं हैं। ये तो आपके साथ मॉर्निंग वॉक करते-करते आपको जीवन का दर्शन समझानेवाले आपके ऐसे मित्र हैं, जिन्हें आप कुछ भी कह सकते हो और वे वैल्यूशीट पर बैठे बिना आपको समझाने का प्रयास करेंगे। हमारा विश्वास है कि अगर आप कृष्ण को अपना मानोगे तो वे आपको इतना अपना लगेंगे कि आपको कभी किसी मित्र की, साथी की, किसी सलाहकार अथवा किसी के सहारे की खोज नहीं करनी पड़ेगी।
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अनुवाद : डॉ. अंजना संधीर
कृष्ण एक ऐसा व्यक्तित्व हैं, जिन्हें आप ‘विराट्’ कह सकते हैं। ‘महाभारत’ में कृष्ण एक राजनीतिज्ञ के रूप में प्रकट होते हैं तो ‘भागवत’ में उनका दैवी स्वरूप दिखाई देता है। ‘गीता’ में वे गुरु हैं, ज्ञान का भंडार हैं। ईश्वर होते हुए भी उन्होंने मानव का ही जीवन जीया। वे एक ऐसे इनसान हैं, जिनका शरीर शायद यह दुनिया छोड़कर चला गया, परंतु आत्मा की प्रबलता, स्वच्छता या दिव्यता सर्वव्यापी बन गई। मृत्यु को देख चुके, अनुभव कर चुके कृष्ण जीवन के अंतिम क्षणों में जीवन की कुछ घटनाओं को फिर एक बार देखते हैं, उनकी अनुभूति करते हैं, उन्हें फिर जीते हैं। जीवन के अंतिम प्रयाण से पहले के कुछ क्षणों का एक सूक्ष्म पड़ाव है—‘कृष्णायन’।
प्रस्तुत पुस्तक में वह कृष्ण हैं, जिन्हें आप कॉफी की टेबल पर सामने देख सकते हैं। ये वह कृष्ण हैं, जो आपकी दैनिक चर्या में आपके साथ रहेंगे। ये कोई योगेश्वर, गिरधारी, पाञ्चजन्य फूँकनेवाले, गीता का उपदेश देनेवाले कृष्ण नहीं हैं। ये तो आपके साथ मॉर्निंग वॉक करते-करते आपको जीवन का दर्शन समझानेवाले आपके ऐसे मित्र हैं, जिन्हें आप कुछ भी कह सकते हो और वे वैल्यूशीट पर बैठे बिना आपको समझाने का प्रयास करेंगे।
हमारा विश्वास है कि अगर आप कृष्ण को अपना मानोगे तो वे आपको इतना अपना लगेंगे कि आपको कभी किसी मित्र की, साथी की, किसी सलाहकार अथवा किसी के सहारे की खोज नहीं करनी पड़ेगी।
Book Details
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ISBN9788173158162
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हिन्दी के प्रख्यात रचनाकार राजकमल चौधरी की बहुचर्चित-बहुप्रशंसित कृति है ‘मछली मरी हुई’। लेखक ने अपनी इस महत्त्वाकांक्षी कृति में जहाँ महानगर कलकत्ता के उद्योग जगत की प्रामाणिक और सजीव तस्वीर प्रस्तुत की है, वहीं आनुषंगिक विषय के रूप में समलैंगिक स्त्रियों के रति-आचरण का भी इस उपन्यास में सजीव चित्रण किया है। इसमें ठनकती हुई शब्दावली और मछली के प्रतीक का ऐसा सर्जनात्मक प्रयोग किया गया है कि समलैंगिक रति-व्यापार तनिक भी फूहड़ नहीं हुआ है। इन पात्रों को लेखक की करुणा सर्वत्र सींचती रहती है।
उपन्यास का प्रमुख पात्र निर्मल पद्मावत हिन्दी उपन्यास साहित्य का अविस्मरणीय चरित्र है। हिंस्र पशुता और संवेदनशीलता का, आक्रामकता और उदासी का, सजगता और अजनबीपन का, शक्ति और दुर्बलता का ऐसा दुर्लभ मिश्रण हिन्दी के शायद ही किसी उपन्यास में मिलेगा।
‘मछली मरी हुई’ के अधिकांश पात्र मानसिक विकृतियों के शिकार हैं, पर उपन्यासकार ने उनके कारणों की तरफ़ संकेत कर अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचय दिया है। यह प्रतिबद्धता उद्योगपतियों के व्यावसायिक षड्यंत्र, भ्रष्ट आचरण आदि की विवेकपूर्ण आलोचना के रूप में भी दिखाई देती है। इस उपन्यास के केन्द्रीय पात्र निर्मल पद्मावत की कर्मठता, मज़दूरों के प्रति उदार दृष्टिकोण, छद्म आचरण के प्रति घृणा, किसी भी हालत में रिश्वत न देने की दृढ़ता, ऊपर से हिंस्र जानवर जैसा दिखने पर भी अपनी माँ, पत्नी और अन्य स्त्रियों के प्रति गहरी संवेदनशीलता—ये सारी बातें उपन्यासकार के गहरे नैतिकता-बोध के प्रमाण हैं।
‘मछली मरी हुई’ राजकमल चौधरी का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। इस उपन्यास को स्त्री-समलैंगिकता पर केन्द्रित भी माना जाता रहा है, जिसका कारण शायद यह है कि काफ़ी शोध के बाद ही लेखक ने इस विषय को यहाँ उठाया है।
Mayapuri
- Author Name:
Shivani
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लखनऊ की मायापुरी और उसमें पालतू बिल्ली-सी घुरघुराती नरमाई लिए प्रतिवेशी प्रवासी परिवार में पहाड़ के सुदूर ग्रामीण अंचल से आई शर्मीली सुन्दरी शोभा का आना बड़े उत्साह का कारण बना, विशेषकर घर की बेटी मंजरी के लिए। पर पिता के बाल्यकालीन मित्र के उस परिवार में घर के बेटे सतीश के विदेश से लौटने पर लहरें उठने लगीं। शोभा और सतीश, अविनाश और मंजरी, युवा जोड़ों के बीच आकर्षण-विकर्षण की रोचक घुमेरियों से भरी ‘मायापुरी’ की कहानी में नकचढ़ी मंत्री दुहिता एक झंझा की तरह प्रवेश करती है, और देखते-देखते सतीश उसकी दुनिया का भाग बनने लगता है। पर क्या नेह-छोह के बन्धन सहज टूटते हैं? नैनीताल वापस लौटी शोभा के जीवन को रुक्की, रामी, रानीसाहिबा और उनके रहस्यमय जीवन की परछाइयाँ कैसे घेरने लगती हैं?
स्त्री-पुरुष के चिरन्तन आकर्षण की मरीचिकामय मायापुरी तथा जीवन की कठोर वास्तविकता के टकराव से भरा यह उपन्यास आज भी अपनी अलग पहचान रखता है।
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