Rameshraaj

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Books

Katha Sunate Baalgeet

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: पत्नी को लेने चले मेंढ़कजी ससुराल, सर से अपने बांधकर एक हरा रूमाल, एक हरा रूमाल, हाथ में लेकर डंडा, दिखने में लगते जैसे मथुरा के पंड़ा... छोटे बच्चों के लिए छोटे, सुंदर बाल गीत
Katha Sunate Baalgeet

Katha Sunate Baalgeet

Rameshraaj

50

₹ 42.5

Vah Yani Mohan Swarup

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: रमेशराज की मुक्तछंद तेवरियाँ
Vah Yani Mohan Swarup

Vah Yani Mohan Swarup

Rameshraaj

50

₹ 42.5

Rameshraaj Ke Kundaliya Chand

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: इस पुस्तक में मैंने कुण्डलिया छंद के तीन प्रकारों में कविताएँ लिखी हैं, जो निम्नलिखित रूप में हैं- 'नव कुंडलिया 'राज' छंद' , छंद शास्त्र और साहित्य-क्षेत्र  में मेरा एक अभिनव प्रयोग है | इस छंद की रचना करते हुए मैंने इसे 16-16 मात्राओं के 6 चरणों में  बाँधा है, जिसके हर चरण में 8 मात्राओं  के उपरांत सामान्यतः (कुछ अपवादों को छोडकर ) आयी 'यति' इसे गति प्रदान करती है | पूरे छंद के 6 चरणों में 96 मात्राओं का समावेश किया गया है | 'सर्प कुंडली 'राज' छंद' भी    छंदशास्त्र और साहित्य-क्षेत्र  में मेरा एक अभिनव प्रयोग है | इस छंद की रचना करते हुए मैंने इसे 13, 13 मात्राओं के दो चरणों से 26 मात्राओं की एक पंक्ति के रूप में  बाँधा है, जिसके हर चरण में 13 मात्राओं  के उपरांत सामान्यतः (कुछ अपवादों को छोडकर ) आयी 'यति' इसे गति प्रदान करती है | कुंडलिया दोहा और रोला के संयोग से बना छंद है। इस छंद के 6 चरण होते हैं तथा प्रत्येकचरण में 24 मात्राएँ होती है। कुंडलिया के पहले दो चरण दोहा तथा शेष चार चरण रोला से बने होते हैं। दोहा के प्रथम एवं तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।रोला का प्रथम चरण11मात्राओं तथा दूसरा चरण 13 मात्राओं का होता है।
Rameshraaj Ke Kundaliya Chand

Rameshraaj Ke Kundaliya Chand

Rameshraaj

99

₹ 84.15

Jivan Kati Patang Re…

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Rating:
    ... ... ...
  • Book Type:
  • Description: सर्पकुण्डली राज छंद, मुक्तक विन्यास, पद जैसी शैली , जनकछन्द, लययुक्त हाइकुदार, वर्णिक छंद में तेवरियाँ
Jivan Kati Patang Re…

Jivan Kati Patang Re…

Rameshraaj

70

₹ 59.5

Mat Kaato Van

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: पर्यावरण सुरक्षा को लेकर एक बेहतरीन चिंतन से युक्त बालगीत संग्रह - मत काटो वन विगत पचास वर्षों से साहित्य की सेवा में लीन सुकवि रमेशराज ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में अनवरत लिखा है। व्यंग्य, लेख, निबंध, लघुकथा, कहानी, गीत, ग़ज़ल से लेकर हाइकु, जनक छंद, रसिया, लांगुरिया, कहमुकरी, चतुष्पदी, कवित्त, घनाक्षरी, दोहे, मुक्तछंद कविताएं, तेवरी, अर्थात् हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर शास्त्रसम्मत तरीके से अपनी क़लम का जादू बिखेरा है। मौलिक प्रयोगों के अंतर्गत अनेक छंदों को तोड़कर अनेक छंदों का निर्माण किया है। लीक से हटकर दो मौलिक छंद -”नव कुंडलिया राज छंद” तथा “सर्प कुंडली राज छंद” भी छंदकाव्य में जोड़े हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी सुकवि रमेशराज ने बच्चों को संस्कारवान बनाने हेतु ढेरों बालगीत भी लिखे हैं। छह बालगीत संग्रहों के उपरांत आपका सातवां बालगीत संग्रह - “मत काटो वन” रचनाएं प्रकाशन बेंगलुरु से प्रकाशित है। इस संग्रह के समस्त बालगीत बच्चों को सामाजिक दायित्वों और पर्यावरण सुरक्षा के लिए प्रेरणा देते हैं। संग्रह के कई गीत कभी कुल्हाड़ी से तो कभी आदमी से 'न काटे जाने के प्रति' निवेदन करते हैं तो कई गीतों में बच्चे बादल का रूप धारण कर मरुथल में बरसकर धरा को हरा-भरा करने को लालायित दिखते हैं। बच्चे कभी दीन-दुखियों के प्रति करुणा का भाव प्रस्तुत करते हैं तो कभी सैरसपाटे के बाद पढ़ाई करने के लिए सजग हो उठते हैं। ये बच्चे रावण को तो जलाना चाहते हैं, किंतु उनकी दृष्टि में वह रावण है विषमता, भूख, गरीबी का रावण। इस रावण को ही वे जलाकर अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करने की ओर अग्रसर होना चाहते हैं। कुल मिलाकर “मत काटो वन” सुकवि रमेशराज के बालगीतों का ऐसा सद्यः प्रकाशित संग्रह है जो बच्चों को सदाचरण, सामाजिक दायित्वों के प्रति प्रेरित करता है। जिसके अंतर्गत बच्चे समझदार बनकर असंगतियों विकृतियों, हिंसा आदि को समाप्त करने की एक जानदार कोशिश करते है। आशा है विगत बालगीत संग्रहों की भांति यह बालगीत संग्रह - “ मत काटो वन” भी साहित्य जगत में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज़ कराएगा।
Mat Kaato Van

Mat Kaato Van

Rameshraaj

50

₹ 42.5

Tevar Saptak

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: तेवरी को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में श्री रमेशराज का नाम अनायास ही सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता। इसके लिए उनका अथक परिश्रम और संघर्ष का अनूठा इतिहास उनके द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका ' तेवरीपक्ष' से प्रारंभ होता है। “ तेवरी एक स्वतंत्र विधा है”, यह सिद्ध करने के लिए वे निरंतर अपने आलेखों के माध्यम से तेवरी के शिल्प पर प्रामाणिक चर्चा करते रहे हैं। तेवरी के पृथक रूप - रसरूप को समझाने के लिए एक नितांत मौलिक रस, ' विरोधरस ' की स्थापना भी उन्होंने की है। छंद के क्षेत्र में नए-नए छंदों के साथ तेवरियों का रचाव अंततः इस भ्रम को तोड़ने में सफल रहता है कि तेवरी ग़ज़ल की नक़ल न होकर अपना एक पृथक अस्तित्व रखती है। तेवरी को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान दिलाने में उनका सद्यः प्रकाशित लंबी-लंबी तेवरियों का संग्रह -तेवर सप्तक उन सारी खूबियों को समाहित किए है, जिनके माध्यम से आसानी से यह सिद्ध किया जा सकता है कि तेवरी का अपना एक अलग नया और मौलिक काव्यशास्त्र है। “सप्तक” साहित्य के क्षेत्र में कोई नया नाम नहीं है। रेख़्ता, हिंदवी शब्दकोशों के अनुसार, सप्तक शब्द के “एक ही प्रकार की सात वस्तुओं” या “कृतियों”, “संगीत में सात स्वरों” के समूह या सात कवियों के एक मंडल द्वारा संकलित कविता के संग्रह को “सप्तक” कहा जाता है। उपरोक्त विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए साहित्य के जाने माने कवि श्री अज्ञेय द्वारा 1943 ईस्वी में नयी कविता के प्रणयन हेतु सात कवियों का एक मंडल बनाकर संकलित किया गया था “तार सप्तक”। यह संग्रह नयी कविता का प्रस्थान बिंदु रेखांकित किया गया। इस “तार सप्तक” के बाद देखते ही देखते, गीत सप्तक, ग़ज़ल सप्तक, कविता सप्तक, ग़ज़ल कविता सप्तक, दोहा सप्तक, सजल सप्तक आदि अनेक सप्तक प्रकाश में आए। जिनमें “गजल कविता सप्तक”, संपादक -जितेंद्र चौहान पार्वती प्रकाशन, इंदौर, तथा “ग़ज़ल सप्तक”, संपादक-राम निहाल गुंजन एवं मथुरा में हिन्‍दी सजल सर्जना समिति के तत्‍वावधान में प्रथम हिन्‍दी सजल महोत्‍सव, 2017 में पद्मश्री गोपालदास नीरज के कर कमलों से ‘‘सजल सप्‍तक ’’ का लोकार्पण हुआ। “सप्तक” की इन्हीं मान्यताओं या विशेषताओं को को ध्यान में रखते हुए श्री रमेशराज के इस “तेवर सप्तक” में भी सौ-सौ तेवर वाली सात लंबी तेवरियों को सात शतकों के रूप में एक साथ प्रस्तुत किया है। “तेवर सप्तक” के अंतर्गत शतक के रूप में इन सात लंबी तेवरियों को निम्न नामों से इस प्रकार रखा गया है - 1.घड़ा पाप का भर रहा, 2. अंतर आह अनंत अति, 3. ककड़ी के चोरों को फांसी, 4. मन के घाव नये न ये, 5. रावण कुल के लोग, 6. धन का मद गदगद करे 7. मेरा हाल सोडियम-सा है। सात तेवर शतकों के बना रमेशराज का तेवर सप्तक भी सुधी पाठकों के बीच है। अन्य सप्तकों की तरह इस सप्तक का भी साहित्य जगत में स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है। ~विनोद भारती ' व्यग्र'
Tevar Saptak

Tevar Saptak

Rameshraaj

99

₹ 84.15

Udho Kahiyo Jay

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: गोपियों को आमजन का प्रतिनिधि और उद्धव को कृष्णरूप में गद्दी पर बैठे कंस जैसे हर शासक का संदेशवाहक मानकर पुराने प्रसंग को नये सन्दर्भों में पिरोकर रची गयी तेवरीकार रमेशराज नयी कृति “ऊधौ कहियो जाय“ तेवरी-शतक में पाठकों के समक्ष है | शतकों की परम्परा में प्रस्तुत यह तेवरी-शतक पठनीय ही नहीं, इस कारण भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उद्धव जो कृष्ण के दूत बनकर गोपियों के समक्ष आते हैं तो गोपियाँ उनसे कोई विरह या प्रेम-प्रसंग नहीं रखतीं बल्कि उनकी पीड़ा तो उस सिस्टम की बखिया उधेड़ती है जो जाने-अनजाने आमजन का सुख-चैन लीलने को आतुर है |
Udho Kahiyo Jay

Udho Kahiyo Jay

Rameshraaj

99

₹ 84.15

Chijate Sukhon ke bich

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: रमेशराज की मुक्तछंद कविताएँ
Chijate Sukhon ke bich

Chijate Sukhon ke bich

Rameshraaj

75

₹ 63.75

Mummy Yadi Main Badal Hota

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Rating:
    ... ... ... ...
  • Book Type:
  • Description: विगत पचास वर्षों से साहित्य की सेवा में लीन सुकवि रमेशराज ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में अनवरत लिखा है। व्यंग्य, लेख, निबंध, लघुकथा, कहानी, गीत, ग़ज़ल से लेकर हाइकु, जनक छंद, रसिया, लांगुरिया, कहमुकरी, चतुष्पदी, कवित्त, घनाक्षरी, दोहे, मुक्तछंद कविताएं, तेवरी, अर्थात् हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर शास्त्रसम्मत तरीके से अपनी क़लम का जादू बिखेरा है। मौलिक प्रयोगों के अंतर्गत लीक से हटकर दो मौलिक छंद -”नव कुंडलिया राज छंद” तथा “सर्प कुंडली राज छंद” भी छंदकाव्य में जोड़े हैं। बच्चों के लिए कविताएं लिखना निस्संदेह एक सरल कार्य नहीं। रमेशराज ने बच्चों के लिए भी खूब गीत कहानियां लिखी हैं। देश के बड़े-बड़े विद्वान साहित्यकारों को लेकर खूब परिचर्चाएं आयोजित की हैं, जिनमें उन्होंने अपने बाल्यकाल की रोचक घटनाओं पर प्रकाश डाला है। अब तक सात बालगीत संग्रह प्रकाशित होने के उपरांत आपका आठवां सद्यः प्रकाशित बालगीत संग्रह-“मम्मी यदि मैं बादल होता” बच्चों को विभिन्न प्रकार से शिक्षित ही नहीं करता, उन्हें गुणी और ज्ञानवान बनाने का एक उत्तम प्रयास भी करता है। एक बच्चा अपनी मम्मी से बादल बनकर सूखते खेतों पर बरसने की बात कहता है तो दूसरा बच्चा अपनी मम्मी के साथ गीता पढ़ने की बात करता है। पुस्तक के बालगीतों में ऐसे भी कई मोहक दृश्य हैं जिनमें बच्चे तुतलाते हुए मीठी-मीठी बातें करते हैं। नकली मूंछें लगाकर दादा जी बनते हैं। गुब्बारों में हवा भरकर उन्हें फोड़ते हैं और आनंदित होते हैं। जामुन आम और मीठे फल खाने के लिए चुपके से पेड़ों पर चढ़ते हैं। अपनी शरारतों पर मम्मी या दादी की डांट खाने से बचने के लिए तरह तरह के बहाने या किस्से गढ़ते हैं। इन गीतों में बच्चों का हमें नटखट स्वभाव ही देखने को नहीं मिलता, बल्कि कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो भविष्य में बड़े होकर देश के लिए सैनिक बनकर सीमाओं पर दुश्मन के दांत खट्टे करने की बात कहते हैं। वे वीर भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल बनना चाहते हैं। शिवाजी की तरह तलवार लेकर अरिदल का विनाश करने की सौगंधें खाते हैं। वे कहते हैं कि संसार को नई रोशनी से जगमग करेंगे। ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाएंगे। सद्भाव का अमृत सबको पिलाएंगे। कुल मिलाकर रमेशराज ने अपने इस बालगीत संग्रह “मम्मी यदि में बादल होता” में बच्चों के अल्हड़ बेफिक्र नटखट बालजीवन को सजीवता प्रदान की है तो दूसरी तरफ उन्हें ऐसा भावी नागरिक बनाने की कोशिश की है जो अपने पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्र के दायित्वों को समझे और उनका पालन करे। ~विनोद भारती 'व्यग्र'
Mummy Yadi Main Badal Hota

Mummy Yadi Main Badal Hota

Rameshraaj

50

₹ 42.5

Peepal Ke Ped Par Baithe Hue Giddh

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: रमेशराज की मुक्तछंद कविताएँ
Peepal Ke Ped Par Baithe Hue Giddh

Peepal Ke Ped Par Baithe Hue Giddh

Rameshraaj

75

₹ 63.75

Rasraaj Virodh

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ नामक निबन्ध में कहते हैं - ‘‘लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने में ब्रह्म की आनंद-कला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचण्डता में भी गहरी आद्रता साथ लगी रहती है---यदि किसी ओर उन्मुख ज्वलंत रोष है तो दूसरी ओर करुण दृष्टि फैली दिखायी पड़ती है। यदि किसी ओर ध्वंस और हाहाकार है तो और सब ओर उसका सहगामी रक्षा और कल्याण है।’’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंध ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’ के उपरोक्त कथन के आधार पर यह तथ्य, सत्य हो जाते हैं कि काव्य को रसनीय मात्र वे भाव ही नहीं बनाते हैं, जो मधुर और कोमल होते हैं। ध्वंस और अत्याचार के वातावरण में प्रतिकार का जो स्वर मुखर होता है, उसकी गति करुणा से उत्पन्न होकर रक्षा और कल्याण की ओर जाती है, जिसके भीतर प्राणी की हर क्रिया, प्रतिक्रिया या अनुक्रिया अधर्म के प्रति असहमति की ऊर्जा बनकर आक्रोश का रूप धारण करती है। आहत मन के भीतर जब ‘आक्रोश’ स्थायित्व ग्रहण करता है तो इस स्थायी भाव का अनुभावन ‘विरोध’ के रूप में सामने आता है। ‘विरोध’ को एक नये रस के रूप में प्रस्तुत करना माना एक नये अनुभव से गुजरना है। लेकिन यह कार्य अटपटा या अतार्किक इसलिए नहीं है क्योंकि ‘‘केवल परम्परागत स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त हो सकते हों, ऐसी बात नहीं है, तथाकथित संचारी भी रसत्व को प्राप्त हो सकते हैं। रुद्रट, उद्भट, आनंदवर्धन आदि अनेक आचार्यों ने इस बात को स्वीकार किया था। आचार्य भोज ने एक और कदम आगे बढ़ाया और कहा कि उनचास भावों के अतिरिक्त भी जो कुछ रसनीय है या बनने की सामर्थ्य रखता है, उसे रस कहा जा सकता है। इसी आधार पर उन्होंने रसों की संख्या का विस्तार भी किया।’’ [रस-सिद्धांत , डा.ऋषि कुमार चतुर्वेदी, पृष्ठ 119-120] अस्तु! नये काव्यरस ‘विरोध’ का रस-रूप वर्तमान यथार्थोंन्मुखी काव्य में अनेक रूप व प्रकारों में दृष्टिगोचर होता है।
Rasraaj Virodh

Rasraaj Virodh

Rameshraaj

149

₹ 126.65

Noor Ka Dastoor Ho Tum

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: रमेशराज का ग़ज़ल संग्रह
Noor Ka Dastoor Ho Tum

Noor Ka Dastoor Ho Tum

Rameshraaj

75

₹ 63.75

Parde ke Piche Hai Khel

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: रमेशराज की मुक्तछंद कविताएँ
Parde ke Piche Hai Khel

Parde ke Piche Hai Khel

Rameshraaj

89

₹ 75.65

Jag Me Noor Badha Kar Dekh

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Rating:
    ... ... ... ... ...
  • Book Type:
  • Description: 1974 से 1990 के बीच लिखी गयीं चतुष्पदियाँ
Jag Me Noor Badha Kar Dekh

Jag Me Noor Badha Kar Dekh

Rameshraaj

50

₹ 42.5

Bagule Pakad Rahi Hai Meen

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: दुहरे तुकांत में तेवरियाँ
Bagule Pakad Rahi Hai Meen

Bagule Pakad Rahi Hai Meen

Rameshraaj

50

₹ 42.5

Waqt Ek Chabuk Hai

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: व्यंग और अन्य कहानी संग्रह
Waqt Ek Chabuk Hai

Waqt Ek Chabuk Hai

Rameshraaj

50

₹ 42.5

Kavita Abhi Zinda Hai

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: रमेशराज की मुक्तछंद कविताएँ
Kavita Abhi Zinda Hai

Kavita Abhi Zinda Hai

Rameshraaj

50

₹ 42.5

Madhu-Sa La

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: हिंदी साहित्य जगत में विलक्षण प्रयोगों, नए-नए मुहावरों, अछूते प्रतीकों, पैनी और व्यंग्यात्मक भाषाशैली के साथ-साथ जनसापेक्ष रचनाशीलता के बल पर श्री रमेशराज ने एक महत्वपूर्ण मुक़ाम हासिल किया है। आपके मौलिक चिंतन में एक तरफ जहां असीम गहराई है, वहीं सम्प्रेषणशीलता सर्वत्र मौजूद होने के कारण पाठक-मन ऊबता नहीं। हर तथ्य आसानी के साथ ग्रहण करते हुए वह आत्मतोष से भर जाता है। तेवरी विधा के सूत्रधार श्री रमेशराज एक तेवरीकार के रूप में ही विख्यात हों, ऐसा कदापि नहीं है। आपने बेहतरीन मुक्तछंद कविताएं लिखी हैं। बालगीत कार के रूप में भी आपकी पहचान है। आपके गीत-नवगीत मन को गहराइयों तक छूते हैं। व्यंग्य व्यंजना का अद्भुत रंग लिए होते हैं। आपका चिंतन 'कविता क्या है?' जैसे मूलभूत प्रश्न को सुलझाता है। रस पर आपकी सूक्ष्म पकड़ है। समकालीन यथार्थवादी काव्य की रस-समस्या का समाधान खोजते हुए आपने एक नए रस "विरोधरस" की मौलिक खोज की है। काव्य की आत्मा पर चिंतन करते हुए "साधारणीकरण" के स्थान पर एक नया सिद्धांत "आत्मीयकरण" दिया है। नए-नए छन्दों को प्रतिष्ठापित करने वाले श्री रमेशराज की ताजा काव्यकृति मधु-सा ला (चतुष्पदी-शतक) है, जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक विकृतियों और विसंगतियों पर तीखे प्रहार किए गए हैं।यथा- नसबंदी पर देते भाषण, जिनके दस लल्ली-लाला हाला पीकर बोल रहे हैं, ‘बहुत बुरी होती हाला’। अंधकार के पोषक देखो, करने आये भोर नयी नयी आर्थिक नीति बनी है, आज प्रगति की मधुशाला।। कवि ने अधर्मी साधुओं मौलवियों के दुराचरण पर बिना भेदभाव किये तटस्थ भाव से तीखे व्यंग्य कसे हैं- मुल्ला-साधु-संत ने चख ली, राजनीति की अब हाला गुण्डे-चोर-उचक्के इनके, आज बने हैं हमप्याला। जनसेवक को शीश नवाते, झट गिर जाते पाँवों पर ये उन्मादी-सुख के आदी, प्यारी इनको मधुशाला।। दूषित होते पारिवारिक परिवेश का सजीव चित्रण देखिए- बेटे के हाथों में बोतल, पिता लिये कर में प्याला इन दोनों के साथ खड़ी है, कंचनवर्णी मधुबाला। गृहणी तले पकौड़े इनको, गुमसुम खड़ी रसोई में नयी सभ्यता बना रही है, पूरे घर को मधुशाला।। पारिवारिक मूल्यों में आयी गिरावट पर कवि की पैनी पकड़ इसप्रकार है- बेटे की आँखों में आँसू, पिता दुःखों ने भर डाला मजा पड़ोसी लूट रहे हैं, देख-देख मद की हाला। इन सबसे बेफिक्र सुबह से, क्रम चालू तो शाम हुयी पूरे घर में महँक रही है, सास-बहू की मधुशाला।। आज हमारा समाज सभ्यता के नाम पर कितना संस्कारविहीन हो गया है- मरा पड़ौसी, उसके घर को दुःख-दर्दों ने भर डाला हरी चूड़ियाँ टूट गयीं सब, हुई एक विधवा बाला। अर्थी को मरघट तक लाते, मौन रहे पीने वाले दाहकर्म पर झट कोने में, महँकी उनकी मधुशाला।। एक चतुष्पदी में सियासत का षडयंत्र देखिए- उसने की है यही व्यवस्था, दुराचरण की पी हाला प्याला जिसके हाथों में हो, बन जा ऐसा मतवाला। मत कर चिन्ता तू बच्चों की, मत बहरे सिस्टम पर सोच तेरी खातिर जूआघर हैं, कदम-कदम पर मधुशाला।। समाज को चेतना प्रदान करने वाले कवि का आचरण आज कैसा जनविरोधी हो गया है- कलमकार भी धनपशुओं का, बना आजकल हमप्याला दोनों एक मेज पर बैठे, पीते हैं ऐसी हाला। निकल रहा उन्माद कलम से, घृणा भरी है लेखों में महँक छोड़ती अब हिंसा की, अलगावों की मधुशाला।। दुष्टों, दुराचारियों के सम्मुख नतमस्तक होते क़लम के सिपाहियों पर तंज कसते हुए कवि कहता हैं- सबसे अच्छी मक्खनबाजी, हुनर चापलूसी का ला तुझको ऊँचा पद दिलवाये, चाटुकारिता की हाला। स्वाभिमान की बात उठे तो, दिखला दे तू बत्तीसी कोठी बँगला कार दिलाये, बेशर्मी की मधुशाला।। सारा परिवेश विषैला हो चुका है। हर सियासी दल से जनता को धोखा मिल रहा है। पूरा का पूरा सिस्टम एक अनसुलझा सवाल बन गया है। फिर भी कवि हार न मानते हुए रहनुमाओं से यह सवाल करता है तो करता है- कब तक सपना दिखलाओगे, गांधी के मंतर वाला और पियें हम बोलो कब तक, सहनशीलता की हाला। अग्नि-परीक्षा क्यों लेते हो, बंधु हमारे संयम की कब तक कोरे आश्वासन की, भेंट करोगे मधुशाला।। कुल मिलाकर रमेशराज जी के इस मधु-सा ला (चतुष्पदी-शतक) का साहित्य-जगत में उनकी अन्य कृतियों की तरह स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है। ~अनिल 'अनल'
Madhu-Sa La

Madhu-Sa La

Rameshraaj

55

₹ 46.75

Rameshraaj - Satsai

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: हिंदी साहित्य में 'सतसई परंपरा' का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। सात सौ दोहों के गागर में सागर भरने की यह कला जितनी कठिन है, उतनी ही कालजयी भी है। कवि रमेशराज जी का rachnaye से नव-प्रकाशित संग्रह 'रमेशराज सतसई' इसी समृद्ध परंपरा की अगली और बेहद मज़बूत कड़ी है। यह संग्रह केवल दोहों का संकलन नहीं है, बल्कि यह हमारे समकालीन समाज, राजनीति, प्रेम और मानवीय विसंगतियों का एक जीवंत दस्तावेज़ है। रमेशराज जी के दोहे आज के समय की सबसे बड़ी विडंबनाओं पर सीधा प्रहार करते हैं। राजनीति और समाज में फैले पाखंड को उजागर करने में कवि की लेखनी अद्भुत धार का परिचय देती है। बगुला भगतों की आधुनिक परिभाषा गढ़ते हुए वे लिखते हैं: कर मे अपने थाम कर गीता वैद कुरान। मछली पालन पर दिया बगुले ने व्याखान। आज की व्यवस्था में 'सत्य' की जो दुर्दशा है, उसे कवि ने ईसा मसीह के प्रतीक से जोड़ा है: सच सूली लटका दिया, तन मे ठोकी कील। विजय धरम की हो गई देते लोग दलील। आज के दौर में जब 'दिखावा' ही योग्यता का पैमाना बन चुका है, तब रमेशराज कबीर की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। वे 'टैलेंट' और 'सेंट' (इत्र) जैसे आधुनिक शब्दों को दोहे के पारंपरिक ढांचे में इस तरह पिरोते हैं कि बात सीधे पाठक के मर्म को छूती है: कबिरा आज समाज में ढोंग बना टेलेंट। मृग की कुंडलि में बसे कस्तूरी कौ सेंट। दुष्टों और सत्ताधीशों के सामने याचक न बनने का स्वाभिमान भी इस सत्सई की एक बड़ी विशेषता है। 'चाकू और खरबूजे' के सटीक दृष्टांत अलंकार से वे नीति की शाश्वत बात कह जाते हैं: खल के सम्मुख क्यों करें बन याचक सम्बाद। करबूजे क़ी कब सुनी चाकू ने फरियाद। रमेशराज जी की दृष्टि केवल व्यवस्था के अंतर्विरोधों तक सीमित नहीं है; वे जीवन के रागात्मक पक्ष को भी उतनी ही शिद्दत से जीते हैं। प्रेम पर बढ़ती उम्र का कोई असर नहीं होता, इस शाश्वत सत्य को वे बेहद खूबसूरती से रेखांकित करते हैं: प्रिय क़ी चितवन आज भी दे पहले-सा नूर। कभी बुढ़ापा प्यार पर आता नहीं हुजूर। कवि ने भाषा के व्याकरण को ही प्रेम का माध्यम बना दिया है। हिंदी और संस्कृत व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों (प्रत्यय, उपसर्ग, संधि, समास) का ऐसा काव्यात्मक उपयोग दुर्लभ है। यह दोहा इस संग्रह के भाषाई अधिकार और शिल्प-सौंदर्य की पराकाष्ठा है: तुम प्रत्त्यय उपसर्ग-सी, तुम ही सन्धि समास। शब्द-शब्द वक्रोक्ति-सा, बातों में अनुप्रास। निष्कर्ष यह है कि 'रमेशराज सतसई' के ये दोहे अपनी सहजता, गेयता (गाने योग्य) और मारकता के कारण पाठकों के कंठ का हार बनने की पूरी क्षमता रखते हैं। रमेशराज ने पारंपरिक छंद 'दोहा' को २१वीं सदी के सरोकारों से जोड़कर भाषा और समाज दोनों का बड़ा उपकार किया है। हिंदी जगत में इस कृति का स्वागत एक क्लासिक (कालजयी) रचना के रूप में होगा, ऐसा दृढ़ विश्वास है।
Rameshraaj - Satsai

Rameshraaj - Satsai

Rameshraaj

149

₹ 126.65

Lambi Muchon Wali Billi

  • Author Name:

    Rameshraaj

  • Book Type:
  • Description: छोटे बच्चों के लिए छोटे, सुंदर बाल गीत
Lambi Muchon Wali Billi

Lambi Muchon Wali Billi

Rameshraaj

50

₹ 42.5

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